हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , आयतुल्लाह फ़ाज़िल लंकरानी ने जामेअतुल मुस्तफ़ा अल-आलमिया के मुज्तमा-ए-आमूज़िश-ए-आली फ़िक़्ह (मदरसा-ए-हुज्जतिया) के शिक्षकों की बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि मुबाहिसा हौज़ा की पहचान है और हौज़ा के विशाल वैज्ञानिक एवं शैक्षिक विरसे के निर्माण में इसका बुनियादी योगदान रहा है।
उन्होंने कहा कि अतीत में पढ़ाई केवल शिक्षक द्वारा विषय प्रस्तुत करने और छात्रों के नोट्स लेने तक सीमित नहीं थी, बल्कि शिक्षक और छात्रों के बीच सवाल-जवाब तथा वैज्ञानिक चर्चा भी दरस का महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करती थी। उनके अनुसार, संक्षिप्त पुस्तकों और आसान शरहों का इस्तेमाल अपनी जगह उचित है, लेकिन यदि वे मूल और गहरी इल्मी किताबों का स्थान ले लें तो छात्रों में गहन अध्ययन और वैज्ञानिक चर्चा का रुझान कम हो सकता है।
आयतुल्लाह फ़ाज़िल लंकरानी ने रसाइल और किफ़ाया जैसी बुनियादी उसूली किताबों के महत्व पर ज़ोर देते हुए कहा कि नई इल्मी किताबों का इस्तेमाल इन पुस्तकों के साथ किया जाना चाहिए, उनकी जगह नहीं।
उन्होंने बहस-मुबाहिसा को पुनर्जीवित करने के लिए केवल पुरस्कार को पर्याप्त न बताते हुए कहा कि इसके लिए पाठ्यक्रम और दर्स में इल्मी गहराई पैदा करना तथा छात्रों में हौज़वी उलूम की क़द्र और अहमियत का एहसास बढ़ाना ज़रूरी है।
उन्होंने कहा कि फ़िक़्ह केवल व्यक्तिगत मसलों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सामाजिक समस्याओं के समाधान की भी व्यापक क्षमता मौजूद है। इसलिए फ़िक़्ह-ए-इज्तिमाई यानी सामाजिक फ़िक़्ह पर पहले से अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए।
उन्होंने आगे कहा कि बहस-मुबाहिसा इल्मी अंदाज़ में और “जिदाल-ए-अहसन” के दायरे में होना चाहिए। इसका उद्देश्य सत्य और वास्तविकता तक पहुँचना होना चाहिए, न कि केवल बहस करना, ज़िद करना या दूसरे पक्ष को नीचा दिखाना।
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